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लघु कहानी

अक्ल के अंधे प्रवीण कुमार के एक मित्र हैं--- हितैषी राय . कुछ-एक लोगों के साथ मिलकर उन्होंने एक कल्याणकारी संस्था बनायी. संस्था का नाम रखा -- 'जन कल्याण.' हालांकि उनकी संस्था छोटी है , लेकिन उनकी भावी योजनाएं बड़ी हैं. फिलहाल उनकी योजना एक अनाथालय भवन निर्माण की है . एक दिन हितैषी राय दान लेने के लिए प्रवीण के पास गए. बोले- "प्रवीण जी, आप मेरे परम मित्र हैं. हमारे शुभ कार्य अनाथालय के भवन-निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दीजिए और दान देने के लिए अपने सेठ मित्रों के नाम भी सुझाइए." दान देने के बाद प्रवीण कुमार ने नगर के उद्योगपति गिरधारी लाल का नाम सुझाया और बात-बात में यह भी बता दिया -- "गिरधारी लाल ऎसी तबियत के शख्स हैं कि दान देने के लिए उन्हें किसी मित्र के सिफारिशी ख़त की ज़रूरत नहीं पड़ती. दूसरे दिन ही हितैषी राय अपने कुछ साथियों के साथ दान लेने के लिए गिरधारी लाल के पास पहुंच गये. रास्ते में उन्होंने अपने सथियों को सावधान कर दिया --'हमें गिरधारी लाल से यह कहने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है कि दान लेने के लिए प्रवीण कुमार ने हमे आपके पास भेजा है. ख...

लघुकथाएं

अपने–अपने सन्दर्भ इस भयंकर ठंड में भी वेद बाबू दूध वाले के यहाँ मुझसे पहले बैठे मिले। मंकी कैप से झाँकते उनके चेहरे पर हर दिन की तरह धूप–सी मुस्कान बिखरी थी। लौटते समय वेदबाबू को सीने में दर्द महसूस होने लगा। वे मेरे कंधे, पर हाथ मारकर बोले–‘‘जानते हो, यह कैसा दर्द है?’’मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना मद्धिम स्वर में बोले–‘‘यह दर्दे–दिल है। यह दर्द या तो मुझ जैसे बूढ़ों को होता है या तुम जैसे जवानों को।’’ मैं मुस्करा दिया। धीरे–धीरे उनका दर्द बढ़ने लगा। ‘‘मैं आपको घर तक पहुँचा देता हूँ।’’ मोड़ पर पहुँचकर मैंने आग्रह किया–‘‘आज आपकी तबियत ठीक नहीं लग रही है।’’ ‘‘तुम क्यों तकलीफ करते हो? मैं चला जाऊँगा। मेरे साथ तुम कहाँ तक चलोगे? अपने वारण्ट पर चित्रगुप्त के साइन होने भर की देर है।’’ वेद बाबू ने हंसकर मुझको रोकना चाहा। मेरा हाथ पकड़कर आते हुए वेदबाबू को देखकर उनकी पत्नी चौंकी–‘‘लगता है आपकी तबियत और अधिक बिगड़ गई है? मैंने दूध लाने के लिए रोका था न?’’ ‘‘मुझे कुछ नहीं हुआ। यह वर्मा जिद कर बैठा कि बच्चों की तरह मेरा हाथ पकड़कर चलो। मैंने इनकी बात मान ली।’’ वे हँसे उनकी पत्नी...

लघुकथाएं

मुखौटा नेताजी को चुनाव लड़ना था। जनता पर उनका अच्छा प्रभाव न था। इसके लिए वे मुखौटा बेचने वाले की दूकान में गए। दूकानदार ने भालू, शेर, भेडिए,साधू–संन्यासी के मुखौटे उसके चेहरे पर लगाकर देखे। कोई भी मुखौटा फिट नहीं बैठा। दूकानदार और नेताजी दोनों ही परेशान। दूकानदार को एकाएक ख्याल आया। भीतर की अँधेरी कोठरी में एक मुखौटा बरसों से उपेक्षित पड़ा था। वह मुखौटा नेताजी के चेहरे पर एकदम फिट आ गया। उसे लगाकर वे सीधे चुनाव–क्षेत्र में चले गए। परिणाम घोषित हुआ। नेताजी भारी बहुमत से जीत गए। उन्होंने मुखौटा उतारकर देखा। वे स्वयं भी चौंक उठे–वह इलाके के प्रसिद्ध डाकू का मुखौटा था। >>>>>>>>>>>>>>>>>> दूसरा सरोवर एक गाँव था। उसी के पास में था स्वच्छ जल का एक सरोवर। गाँव वाले उसी सरोवर का पानी पीते थे। किसी को कोई कष्ट नहीं था। सब खुशहाल थे। एक बार उजले–उजले कपड़े पहनकर एक आदमी गाँव में आया। उसने सब लोगों को मुखिया की चौपाल में इकट्ठा करके बहुत अच्छा भाषण दिया। उसने कहा–‘‘सरोवर आपके गाँव में एक मील की दूरी पर है। आप लोगों को पानी ल...

लघु कहानी पांच लघुकहानियां

अंतर रामप्रसाद बाबू के हाथों में बेटी राधा का पत्र था, जिसमें उसने लिखा था कि बाबूजी मकान खरीद रही हूं. एक लाख रुपये कम हैं, भेज दें. जैसे ही होंगे तुरंत वापस भेज दूंगी. रामप्रसाद बाबू सोच में पड़ गए. बेटी को धन देना तो चाहिए पर वापसी तो ठीक नहीं है. फिर दूसरा रास्ता क्या है? अंत में रामप्रसाद बाबू ने बेटी को पत्र लिखा - 'बेटी बहुत मजबूरी है कि तुम्हारी जरूरत पर मेरे हाथ खाली हैं' और फिर डाकघर जाकर पत्र पोस्ट कर दिया. एक हफ्ता ही बीता था कि बेटे का पत्र दिल्ली से आया - 'बाबूजी मकान खरीद रहा हूं कुछ मदद करें.' रामप्रसाद बाबू ने तुरंत पत्नी से बातचीत कर बैंक से रुपये निकलवाए और बैंक ड्राफ्ट बनवाकर बेटे को भेज दिया. इधर रामप्रसाद बाबू काफी बीमार थे, उन्होंने बेटे और बेटी दोनों को तार कर दिया था. बेटे का कहीं पता न था जबकि बेटी तीसरे दिन पहुंच गई और साथ चलने की जिद कर रही थी. रामप्रसाद बाबू मौन, बिस्तर पर लेटे बस बेटी का हाथ अपने हाथ में लेकर रोते जा रहे थे. अवमूल्यन एक अध्यापक अक्सर अपने छात्रों को पढ़ाते समय आदिकाल की सम्मानजनक गुरु-शिष्य परंपरा ...

छाले अब नहीं - हिंदी कहानी

   छाले अब नहीं                                                                                                                                                                                                      दीपू के मुँह में फिर छाले निकल आए थे। तीन दिन से वह ढंग से खाना भी नहीं खा पा रहा। डॉक्टर के पास जाने से अब उसे डर लगता है।   पहले जब छाले होते थे तो डॉक्टर खाने की गोलियाँ लिख देते थे। बी-कॉम्पलैक्स की उन गोलियों से उसके छाले ठीक भी हो जाते थे। गोलियों से जब कोई ...

पिंकी के नखरे

                                                                 एक लड़की थी । उसका नाम पिंकी था । वह बहुत जिद्दी हो गई थी । मम्मी जब भी कहीं बाहर जातीं तो वह कपड़े पहनने में बहुत रोती थी ।मम्मी पहनने को जो भी कपड़े निकालतीं वह उन्हें उठा कर दूर फेंक देती थी। यह ड्रेस नहीं पहननी, इसमें बटन हैं मुझे बटन वाले कपड़े अच्छे नहीं लगते ।....मुझे यह कलर पसन्द नहीं है, यह भी अच्छी नहीं है ,वह भी अच्छी नहीं है।अब पिंकी की  मम्मी ने नए नए कपड़े लाने बन्द कर दिए क्यों कि पिंकी को कोई भी पसन्द नहीं आते थे । एक दिन पिंकी ने कहा -" मम्मी आज मेरी  फ्रेण्ड नीलू की बर्थ डे हैं ,शाम को वहाँ जाना है।'             शाम को मम्मी ने बहुत सुन्दर फ्राक निकाल कर पहनने को दी पर फ्राक देख कर पिंकी ने उसे हटा दिया। मुझे यह नहीं पहननी। मम्मी ने तीन ड्रेस और निकाल कर दी औ...

नन्ही चीखें

चारों ओर से तेज रोशनी का प्रकाश और लाल रंग का आधिपत्य ।उफ़ यह तो लाल खून है । दीवारों पर लाल छींटे तो धरा पर लाल -लाल बिखरा कीच । वहीं इस कीच के मध्य नन्हे -नन्हे नंग -धड़ंग ढेरों भ्रूण हैं और नवजात शिशु  भी खून से लिपटे हाथ-पाँव मार -मार कर चीत्कार कर रहे हैं “हमें मत मारो ! मत करो हम पर अत्याचार । हमें भी जीने दो ! हम भी जीना चाहते हैं । हमें भी दुनिया देखनी है तुम्हारी तरह । बचा लो हमको ! आखिर हमारा कसूर क्या है ? हमें बचा लो–जीने दो हमें भी अपनी तरह , औरों की तरह । इतना ज़ुल्म ना ढाओ –बचा लो–बचालो हमें ! सुनो, सुनो—अरे कोई तो सुनो ! मत मारो ! मत मारो— -चीखों का शोर बढ़ता ही चला जा रहा.था कि उस शोर से घबराकर डॉ .ऊर्जा की नींद टूट गई । वह पसीने से लथपथ थी । ऐसा यथार्थ जिस पर उसका कभी ध्यान ही नहीं गया था , वह स्वप्न बन कर उसे भयभीत कर रहा था । उसकी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी । साइड टेबल पर रखे पानी को पी कर उसने अपना सूखा गला तर किया । फिर.अपनी दोनों टांगो  को छाती से लगाकर घुटनों में मुँह लटकाए,वह् सोच.में डूब गई । .  …सोच , का आधार स्वप्न था जो कुछ इंगित कर रहा था.। ...

सच्चा दोस्त बाल कहानी

स्कूल से लौटते समय अशोक ने अपने मित्र रमन से कहा --"यार मैंने ताश का एक नया खेल सीखा है.. उसे तीन पत्ती कहते हैं, तुम्हें आता है ?'"नहीं।'"अरे यार बहुत आसान है। मैं तुम्हें सिखा दूँगा। इस बार दीपावली के दिन हम लोग यह गेम पैसों से खेलेंगे, बहुत मजा आएगा।'"अशोक मैंने कभी ताश नहीं खेले इसीलिए मुझे ताश का कोई खेल नहीं आता और ना ही मैं सीखना चाहता हूँ। वैसेभी जो खेल पैसों से खेला जाए उसे जुआ कहते हैं और मैं जुआ नहीं खेलता।'"रमन तू मेरा कैसा दोस्त है ?...तुझ से रोज खेलने को नहीं कह रहा, हम तो बस दीपावली के दिन खेलेंगे। अरे यार इस एक दिन जुआ खेलने की छूट तो हमारे परिवार में मिलती है।'इस एक दिनकी छूट ने ही बहुत लोगों को जुआरी बना दिया है। हरेक का स्वयं पर इतना नियंत्रण नहीं होता। एक बार ये चस्का लगजाए तो जिंदगी भर नहीं छूटता। बाबाजी के जमाने में हमारे परिवार में सभी को दीपावली के दिन जुआ खेलनेकी छूट मिली हुई थी। मेरे एक चाचा को तो ताश मेंरुचि नहीं थी। एक दीपावली पर परिवार में सदस्यों की संख्या कम होने की वजह से ताश खेलने में मजा नहीं आ रहा था तो ...