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ओजोन परत

ना ही गर्मी गर्म और ना ही सर्दी सर्द है............. ओजोन का बढ़ता सुराख़ मानव का सिरदर्द है........ तेजाब बरसाते बदल रो रो कर तुमसे कहते हैं .......... ये बारिश की बूंदे नहीं आसमान का दर्द है

लघु कहानी

अक्ल के अंधे प्रवीण कुमार के एक मित्र हैं--- हितैषी राय . कुछ-एक लोगों के साथ मिलकर उन्होंने एक कल्याणकारी संस्था बनायी. संस्था का नाम रखा -- 'जन कल्याण.' हालांकि उनकी संस्था छोटी है , लेकिन उनकी भावी योजनाएं बड़ी हैं. फिलहाल उनकी योजना एक अनाथालय भवन निर्माण की है . एक दिन हितैषी राय दान लेने के लिए प्रवीण के पास गए. बोले- "प्रवीण जी, आप मेरे परम मित्र हैं. हमारे शुभ कार्य अनाथालय के भवन-निर्माण के लिए दिल खोलकर दान दीजिए और दान देने के लिए अपने सेठ मित्रों के नाम भी सुझाइए." दान देने के बाद प्रवीण कुमार ने नगर के उद्योगपति गिरधारी लाल का नाम सुझाया और बात-बात में यह भी बता दिया -- "गिरधारी लाल ऎसी तबियत के शख्स हैं कि दान देने के लिए उन्हें किसी मित्र के सिफारिशी ख़त की ज़रूरत नहीं पड़ती. दूसरे दिन ही हितैषी राय अपने कुछ साथियों के साथ दान लेने के लिए गिरधारी लाल के पास पहुंच गये. रास्ते में उन्होंने अपने सथियों को सावधान कर दिया --'हमें गिरधारी लाल से यह कहने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं है कि दान लेने के लिए प्रवीण कुमार ने हमे आपके पास भेजा है. ख...

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Wednesday, July 1, 2015 प्रशासनिक अधिकारी सुभाष ने खिड़की के बाहर देखते हुए अपनी पत्नी से कहा-- "स्मृति सुनो कुछ लोग गेट से अंदर आ रहे हैं,मुझे पूछें तो कह देना घर पर नहीं हैं।' "ठीक है ' "हाँ कहिये...किस से मिलना है ?' "मैडम हम सुजाता स्कूल से आए हैं ।पुरस्कार वितरण सामारोह में मुख्य अतिथि बनाना चाहते हैं।' "लेकिन मेरे पति तो अभी घर पर नहीं हैं।' "हम आपको अतिथि बनाना चाहते हैं।' "अरे नहीं मुझे ऐसे प्रोग्रामों से क्या लेना देना।मैं तो एक घरेलू महिला हूँ।मेरे पति एक अधिकारी हैं  ,बनाना है तो उन्हें बनाऐ।' "हर कामयाब पति की सफलता के पीछे उसकी पत्नी का हाथ होता है।...आप अपने को कम मत आँकिए ।हम सब आपको ही मुख्य अतिथि बनाने की इच्छा ले कर आये हैं।' "ठीक है मुझे तारीख और समय बता दीजिये .  एक-दो दिन का समय भी दें यदि उस दिन मैं फ्री हुई तो आपको फोन पर स्वीकृति दे दूँगी ।' "थैक्यू मैडम हम परसों इसी टाइम आपको फोन कर लेंगे।'- कह कर वह लोग चले गए । पति ने राहत की साँस लेते हुए कहा--...

उड़ान

मंजिले उन्हें ही मिलती है जिनके सपनो में जान होती है पंखों से कुछ नही होता, हौसलों से उड़न होती है मंजिल तो मील ही जाएगी भटक कर ही सही गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं .....

एक कविता हर माँ के नाम

घुटनों से रेंगते -रेंगते    कब पैरो पर खड़ा हुआ,  तेरी ममता की छाँव में,  जाने कब बड़ा हुआ,  कला टीका दूध मलाई,  आज भी सब कुछ वैसा ही है,  मै ही मै हूँ हर जगह,  प्यार ये तेरा किस्सा है,  सीधा-साधा, भोला-भाला,  मै ही सबसे अच्छा हूँ,  कितना भी हो जाऊ बड़ा ,  "माँ !" मै आज भी तेरा बच्चा हूँ

कुछ छोटे सपनो हिंदी कविता

कुछ छोटे सपनो के बदले , बड़ी नींद का सौदा करने , निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! वही प्यास के अनगढ़ मोती ,वही धूप की सुर्ख कहानी , वही आंख में घुटकर मरती ,आंसू की खुद्दार जवानी , ...  हर मोहरे की मूक विवशता ,चौसर के खाने क्या जाने हार जीत तय करती है वे , आज कौन से घर ठहरेंगे....! निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे ! कुछ पलकों में बंद चांदनी ,कुछ होठों में कैद तराने , मंजिल के गुमनाम भरोसे ,सपनो के लाचार बहाने , जिनकी जिद के आगे सूरज, मोरपंख से छाया मांगे , उन के भी दुर्दम्य इरादे , वीणा के स्वर पर ठहरेंगे . निकल पडे हैं पांव अभागे ,जाने कौन डगर ठहरेंगे .....!!

होंगे कामयाब

होंगे कामयाब,  हम होंगे कामयाब एक दिन मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन।  हम चलेंगे साथ-साथ डाल हाथों में हाथ हम चलेंगे साथ-साथ, एक दिन मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन। होगी शांति चारों ओर, एक दिन मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास होगी शांति चारों ओर एक दिन। नहीं डर किसी का आज एक दिन मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास नहीं डर किसी का आज एक दिन। - गिरिजा कुमार माथुर

भरष्टाचार-हो गई है पीर पर्वत-सी

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर,  हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।                                                       मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,                                                       हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

जब जब दर्द का बादल छाया

जब  जब  दर्द  का  बादल  छाया जब  ग़म  का  साया  लहराया जब  आंसू  पलकों  तक  आया जब  यह  तनहा  दिल  घबराया हमने  दिल  को  यह  समझाया दिल   आखिर  तू  क्यूँ  रोता  है दुनिया  में  यूँही  होता  है यह  जो  गहरे  सन्नाटे  हैं वक़्त  ने  सबको  ही  बांटे  हैं थोडा  ग़म   है  सबका  किस्सा थोड़ी  धूप  है  सबका  हिस्सा आँख  तेरी  बेकार  ही  नम  हैं हर  पल  एक  नया  मौसम  है क्यूँ  तू  ऐसे  पल  खोता  है दिल  आखिर  तू  क्यूँ  रोता  है _____________________

मतलब की नाव

जीवन के इस दौर में सब पर आपाधापी छाई हैं दौड़ लगी है बेसुध – अंतहीन इच्छाओं की भरी पिटारी है न चिंता है देश समाज जनहित की बस अपनी ही सुध में पलते हैं हमदर्द, हमराह, हम ख़याल अब अकेले पड़े है तन्हाई में लूट संस्कृति का चालान जोरों पर है मर्यादा की खाल पल पल नुच रही हैं निज स्वार्थ निज लाभ बस इतना ही आंखो में समाता है सुबिधाओं का अम्बार लगाना हर कोई चाहता हैं दिल में भी नही घर में भी नही ख्यालों में भी नही अब किसी के लिए किसी के पास जगह नही मतलब की नाव पर हर कोई सवार हो रखा है और मतलब पुरा होते ही कौन है आप? किसे याद रहता है बड़ी विचित्र हवा चल रही है अब इस अंधी दुनिया में हाय पैसा ! बस पैसा ! की चल रही महामारी हैं रिश्तों की अब किसे जरुरत न ही दोस्त चाहिए अब ख़ुद का सुख ही सर्वस्व है अब इतने में सिमट रही अब दुनिया सारी हैं शान्ति समर्पण और तपस्या सब मौन पड़े है झूठ और हिंसा इस युग के नए नारे है इश्वर को भी चन्दा देकर खरीदने का ढोंग हो रहा है हर और मीनार ऊँची करने में बस लगा हुआ है आज के युग का हर प्रानी धरम सत्य और अहिंसा सब बेमानी है इस दौर में जीवन तो कठिन नही रहा पर मोक्ष जरुर नामुमकिन ...

जीवन में एक सितारा था

जीवन में एक सितारा था माना वह बेहद प्यारा था वह डूब गया तो डूब गया अंबर के आंगन को देखो कितने इसके तारे टूटे कितने इसके प्यारे छूटे जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले पर बोलो टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में वह था एक कुसुम थे उस पर नित्य निछावर तुम वह सूख गया तो सूख गया मधुबन की छाती को देखो सूखी कितनी इसकी कलियाँ मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं पर बोलो सूखे फूलों पर कब मधुबन शोर मचाता है जो बीत गई सो बात गई जीवन में मधु का प्याला था तुमने तन मन दे डाला था वह टूट गया तो टूट गया मदिरालय का आंगन देखो कितने प्याले हिल जाते हैं गिर मिट्टी में मिल जाते हैं जो गिरते हैं कब उठते हैं पर बोलो टूटे प्यालों पर कब मदिरालय पछताता है जो बीत गई सो बात गई मृदु मिट्टी के बने हुए हैं मधु घट फूटा ही करते हैं लघु जीवन ले कर आए हैं प्याले टूटा ही करते हैं फ़िर भी मदिरालय के अन्दर मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं जो मादकता के मारे हैं वे मधु लूटा ही करते हैं वह कच्चा पीने वाला है जिसकी ममता घट प्यालों पर जो सच्चे मधु से जला हुआ कब रोता है चिल्लाता है जो बीत गई सो बात...

Hindi poems

"जो भाग्य में है , वह                भाग कर आएगा, जो नहीं है , वह           आकर भी भाग जाएगा...!" यहाँ सब कुछ बिकता है ,          दोस्तों रहना जरा संभाल के , बेचने वाले हवा भी बेच देते है ,                     गुब्बारों में डाल के , सच बिकता है , झूट बिकता है,                    बिकती है हर कहानी , तीनों लोक में फेला है , फिर भी                   बिकता है बोतल में पानी , कभी फूलों की तरह मत जीना,           जिस दिन खिलोगे ,               ...