आरोप - लघु कथा

                                  आरोप          



                                               
            सुजाता की बेटी, भताजी के लिए दो जोड़ी फ़्रॉक और गोल्ड प्लेटिंग की पायल लाई थी।
           सुजाता को मालुम है उसके ससुराल वाले थोड़े लालची स्वभाव के हैं अत: उसने डाँटते हुए कहा "इतना सब लाने की क्या जरूरत थी,हम तेरा कुछ नहीं रखेंगे।'
           किन्तु उनकी यह बात छोटी बहू को बुरी लग गई।वह अपने पति से कह रही थी -" मम्मी जी की  यह बात मुझे अच्छी नही लगती।हमेशा अपनी बेटी को ही पचती हैं... इस बार वह हमारी बेटी के लिये ।फ्राक व पायल लाई हैं तो मम्मी जी उनको डाँट रही थीं कि क्यो लाई।....मै उनका रख तो नही लूँगी। जितना लाई है उस से ज्यादा का ही दूँगी।'
        "कोई कुछ लाता है तो एक बार को मना तो किया ही जाता है न।तुम यदि मम्मी की बात को इस दृष्टि से देखोगी तो तुम्हे कुछ भी गलत नही लगेगा...टेक इट इजी यार।'
        बहू की बात सुन कर सुजाता का मन कुछ आहत हुआ ।
 अगली बार सुजाता की दूसरी बेटी हिल स्टेशन घूम कर आई थी। वह अपने भतीजे-भतीजियों के लिये कुछ न कुछ लाई थी।बड़ी भाभी मीता का बेटा बड़ा हो चुका था और विदेश मे था तो वह भाभी के लिये साड़ी ले आई थी।बच्चे तो बुआ से उपहार पा कर खुश हो गए किन्तु मीता साड़ी लेने को तैयार नही थी।वह बोली -  "मै आपकी लाई साड़ी कैसे ले सकती हूँ ...आप हमारी छोटी नन्द हैं ,छोटों को तो दिया जाता है... लिया थोडे ही जाता है।'
       बेटी बहुत मायूस हो गई थी -"छोटा, बड़ा कुछ नही होता भाभी।क्या हमेशा लेते ही रहना चाहिए ... कभी हमारा भी तो देने को दिल करता है। मै यह साड़ी बड़े मन से आपके लिये लाई हूँ,आपको लेनी ही होगी।'
      सुजाता ने कहा-  " इतने प्यार से लाई है तो रख लो न मीता।'
     -"मम्मी जी"आप हमेशा अपनी बेटियों को ही पचती हैं ,अब भी उनकी ही तरफ ले कर मुझ से साड़ी लेने को कह रही हैं।'
        बहू का आरोप सुन कर सुजाता सकते मे आ गई।वह सोचने लगी यदि बेटी को किसी के लिये कुछ न लाने को कहूँ तब भी बेटी को पचने का आरोप ....बेटी के लाने पर उसे रख लेने को कहूँ तब भी बेटी को पचने का आरोप....आखिर कौन सा आरोप सही है...या सास होना ही अपने आप मे एक आरोप है ?       

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