दखल - लघुकथा

लघुकथा 

                           दखल     
                                                  

 
माँ ने बहू बेटे को तैयार हो कर बाहर जाते देख कर पूछा --"सुबह सुबह तुम दोनो कहाँ जा रहे हो ?'
 "
माँ अस्पताल जा रहे हैं।'
 "
क्यों,किस की तबियत खराब है ?'
 
बेटे ने सकपकाते हुए कहा --"माँ आपकी बहू फिर माँ बनने वाली है।हम टैस्ट करा कर देखना चाहते हैं  कि गर्भ में लड़का है या लड़की ।'
 "
क्या करोगे पता कर के ?'
 "
करना क्या है माँ लड़की हुई तो सफाई करा देंगे।'
 "
तू ये क्या कह रहा है ?...आज कल लड़कियां भी किसी से कम नहीं हैं ।'
 "
हाँ माँ यह मैं जानता हूँ पर हमारे दो बेटियाँ तो हैं न।क्या आप नहीं चाहतीं कि हमारे एक बेटा भी हो ?  ....अब मैं इतना धन्ना सेठ तो हूँ नहीं कि तीन तीन बेटियों की अच्छी परवरिश कर सकूँ।...अपने यहाँ  लड़कियों की शादी में कितना दहेज चलता है क्या आप नहीं जानतीं ?...वैसे भी बाप दादों का दिया तो   मेरे पास कुछ है नहीं ?'
 
मां ने दुखी स्वर में कहा --"तुम्हारी यह बात तो सही है बेटा कि हम जिन्दगी भर बस गुजारा ही कर  पाए, ...दो कमरे का एक मकान भी नहीं बना सके ,पर ...
 "
पर वर कुछ नहीं माँ,मैं आपका बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन जिन्दगी के कुछ फैसले हम खुद लेना   चाहते हैं...प्लीज इसमें दखल मत दीजिए ।'
  
कहते हुए दोनो घर से बाहर चले गए। 

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