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सच्ची मदद

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एक नन्हा परिंदा अपने परिवार-जनों से बिछड़ कर अपने आशियाने से बहुत दूर आ गया था । उस नन्हे परिंदे को अभी उड़ान भरने अच्छे से नहीं आता था… उसने उड़ना सीखना अभी शुरू ही किया था ! उधर नन्हे परिंदे के परिवार वाले बहुत परेशान थे और उसके आने की राह देख रहे थे । इधर नन्हा परिंदा भी समझ नहीं पा रहा था कि वो अपने आशियाने तक कैसे पहुंचे? वह उड़ान भरने की काफी कोशिश कर रहा था पर बार-बार कुछ ऊपर उठ कर गिर जाता। कुछ दूर से एक अनजान परिंदा अपने मित्र के साथ ये सब दृश्य बड़े गौर से देख रहा था । कुछ देर देखने के बाद वो दोनों परिंदे उस नन्हे परिंदे के करीब आ पहुंचे । नन्हा परिंदा उन्हें देख के पहले घबरा गया फिर उसने सोचा शायद ये उसकी मदद करें और उसे घर तक पहुंचा दें । अनजान परिंदा – क्या हुआ नन्हे परिंदे काफी परेशान हो ? नन्हा परिंदा – मैं रास्ता भटक गया हूँ और मुझे शाम होने से पहले अपने घर लौटना है । मुझे उड़ान भरना अभी अच्छे से नहीं आता । मेरे घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगे । आप मुझे उड़ान भरना सीखा सकते है ? मैं काफी देर से कोशिश कर रहा हूँ पर कामयाबी नहीं म...

माध्यम

Wednesday, July 1, 2015 प्रशासनिक अधिकारी सुभाष ने खिड़की के बाहर देखते हुए अपनी पत्नी से कहा-- "स्मृति सुनो कुछ लोग गेट से अंदर आ रहे हैं,मुझे पूछें तो कह देना घर पर नहीं हैं।' "ठीक है ' "हाँ कहिये...किस से मिलना है ?' "मैडम हम सुजाता स्कूल से आए हैं ।पुरस्कार वितरण सामारोह में मुख्य अतिथि बनाना चाहते हैं।' "लेकिन मेरे पति तो अभी घर पर नहीं हैं।' "हम आपको अतिथि बनाना चाहते हैं।' "अरे नहीं मुझे ऐसे प्रोग्रामों से क्या लेना देना।मैं तो एक घरेलू महिला हूँ।मेरे पति एक अधिकारी हैं  ,बनाना है तो उन्हें बनाऐ।' "हर कामयाब पति की सफलता के पीछे उसकी पत्नी का हाथ होता है।...आप अपने को कम मत आँकिए ।हम सब आपको ही मुख्य अतिथि बनाने की इच्छा ले कर आये हैं।' "ठीक है मुझे तारीख और समय बता दीजिये .  एक-दो दिन का समय भी दें यदि उस दिन मैं फ्री हुई तो आपको फोन पर स्वीकृति दे दूँगी ।' "थैक्यू मैडम हम परसों इसी टाइम आपको फोन कर लेंगे।'- कह कर वह लोग चले गए । पति ने राहत की साँस लेते हुए कहा--...

अधिकार

यह कहानी महात्मा गौतम बुद्ध के बचपन की है। बालक गौतम का हृदय कोमलथा। उसमें जीव-जंतुओं के प्रति करूणा थी। उसका चचेरा भाई देवदत्त क्रूर था। उसे जानवरों का शिकार करने में आनंद आता था। एक बार देवदत्त ने हंस पक्षी को मार गिराया और गौतम ने उसकी जान बचाई। देवदत्त कहता है- ”यह मेरा शिकार है। मुझे दे दो।“ गौतम कहता है-”नहीं ! मैंने इसकी जान बचाई, यह मेराहै।“ देखो कौन जीतता है।,सुबह का समय था। ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी। मगध के राजकुमार सिद्धार्थ राजमहल के बाग में घूम रहे थे। राजकुमार को लोग प्यार से गौतम पुकारते थे। उनके साथ उनका चचेरा भाई देवदत्त भी था। गौतम बहुत दयालु स्वभाव के थे। वह पशु-पक्षियों को प्यार करते, पर देवदत्त कठोर स्वभाव का था। पशु-पक्षियों के शिकार में उसे बड़ा आनंद मिलता।बाग बहुत सुंदर था। तालाब में कमल खिले हुए थे। फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मॅंडरा रही थीं। पेड़ों पर चिड़ियाँ चहचहा रही थीं। राजकुमार गौतम को देखकर बाग के खरगोश और हिरन उनके चारों ओर जमा होगए। गौतम ने बड़े प्यार से उन्हें हरी-हरी घास खिलाई। उसी बीच देवदत्त ने एक तितली पकड़ उसके पंख काट डाले। गौतम को बहुत दुख हुआ-”यह...

सत्यवादी हरिश्चंद्र

बहुत जमाने पहले की बात है। राजा हरिश्चंद्र सच बोलने और वचन. पालन के लिए मशहूर थे। उनकी प्रसिद्धि चारों तरफ फैली थी। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की प्रसिद्धि सुनी। वे स्वयं इसकी परीक्षा करना चाहते थे। क्या हरिश्चंद्र हर कठिनाई झेलकर भी वचन का पालन करेंगे? आओ देखें कि विश्वामित्र ने कैसी परीक्षा ली?,सतयुग में राजा हरिश्चंद्र नाम के एक राजा थे। राजा हरिश्चंद्र दानी थे और वचन के पक्के थे। वे जो वचन देते, उसे अवश्य पूरा करते। उनके बारे में कहा जाता, चाँद और सूरज भले ही अपनी जगह से हट जाएँ, पर राजाहरिश्चंद्र अपने वचन से कभी पीछे नहीं हट सकते। राजा हरिश्चंद्र की तरह ही उनकी रानी शैव्या और राजकुमार रोहिताश्व भी वचन का पालन करना अपना कर्तव्य मानते थे।राजा की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। ऋषि विश्वामित्र ने राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उसी रात राजा हरिश्चंद्र ने एक सपना देखा। सपने में उन्होंने देखा, ऋषि विश्वामित्र को राजा ने अपना पूरा राज-पाट दान में दे दिया है।आँख खुलने पर राजा ने सोचा, अगर सपने में भी उन्होंने अपना साम्राज्य मुनि विश्वामित्र को दान में दे दिया, तब अ...

नमक का स्वाद-Moral Story in Hindi

एक बार एक परेशान और निराश व्यक्ति अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला – “गुरूजी मैं जिंदगी से बहुत परेशान हूँ| मेरी जिंदगी में परेशानियों और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं है| कृपया मुझे सही राह दिखाइये|”गुरु ने एक गिलास में पानी भरा और उसमें मुट्ठी भर नमक डाल दिया| फिरगुरु ने उस व्यक्ति से पानी पीने को कहा|उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया|गुरु :- इस पानी का स्वाद कैसा है ??“बहुत ही ख़राब है” उस ब्यक्ति ने कहा|फिर गुरु उस व्यक्ति को पास के तालाब के पास ले गए| गुरु ने उस तालाब में भी  मुठ्ठी भर नमक डाल दिया फिर उस व्यक्ति से कहा – इस तालाब का पानी पीकर  बताओ की कैसा है|उस व्यक्ति ने तालाब का पानी पिया और बोला – गुरूजी यह तो बहुत ही मीठा है|गुरु ने कहा – “बेटा जीवनके दुःख भी इस मुठ्ठी भर नमक के समान ही है|जीवनमें दुखों की मात्रा वही रहती है – न ज्यादा न कम| लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों का कितना स्वाद लेते है| यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी सोच एंव ज्ञान को गिलास की तरह सीमित रखकर रोज खारा पानी पीते है या फिर तालाब की तरह बनकर मीठा पानी पीते है| ”Moral of The Story“ एक मुट्ठी...