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माँ के नाम

 बचपन में अच्छी लगे, यौवन में नादान ! आती याद उम्र ढले क्या थी माँ कल्यान !!1!! करना माँ को खुश अगर कहते लोग तमाम ! रौशन अपने काम से करो पिता का नाम !!2!! विद्या पाई आपने बने महा विद्वान ! माता पहली गुरु है सबकी ही कल्याण!!3!! कैसे बचपन कट गया, बिन चिंता कल्यान ! पर्दे पिछे माँ रही, बन मेरा भगवान!!4!! माता देती सपन है, बच्चो को कल्यान ! उनको करता पूर्ण जो, बनता बही महान!!5!! बच्चे से पुछो जरा, सबसे अच्छा कौन ! उंगली उठे उधर जिधर, माँ बैठी हो मौन!!6!! माँ कर देती माफ है, कितने करो गुनाह! अपने बच्चों के लिये उसका प्रेम अथाह !!7!!

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही, हो जाता पथ पर मेल कहीं, सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, तय कर लेना कुछ खेल नहीं। दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, सम्मुख चलता पथ का प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। साँसों पर अवलम्बित काया, जब चलते-चलते चूर हुई, दो स्नेह-शब्द मिल गये, मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई। पथ के पहचाने छूट गये, पर साथ-साथ चल रही याद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। जो साथ न मेरा दे पाये, उनसे कब सूनी हुई डगर? मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, राही मर लेकिन राह अमर। इस पथ पर वे ही चलते हैं, जो चलने का पा गये स्वाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद। कैसे चल पाता यदि न मिला होता मुझको आकुल अंतर? कैसे चल पाता यदि मिलते, चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर! आभारी हूँ मैं उन सबका, दे गये व्यथा का जो प्रसाद – जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद।