अधजल गगरी छलकत जाए --

 ऐसा क्यों कहा जाता है कि किसी इंसान की औकात जाननी हो तो एक नज़र उसके जूते पर‌ डालनी चाहिए?

अधजल गगरी छलकत जाए ---

जीवन की चकाचोंध किसी व्यक्ति के रहनसहन के स्तर या उसके शौक मौज की झलक शायद हमे दे जाए मगर इंसान की औकात तो उसके कर्मो से ही झलकती है, उसके हृदय की विराटता और उसके स्वभाव की सरलता में नज़र आती है।

मैंने , कुशाभाऊ ठाकरे , प्यारेलाल खंडेलवाल , नानाजी देशमुख , मामा बालेश्वर दयाल , को नज़दीक से देखा है ,ये सभी बेहद साधारण सी पोशाख में ही रहा करते थे। फिर विनोबा भावे , जयप्रकाश नारायण भी साधारण सी वेशभूषा में ही रहते थे।

फिर गत कई वर्षो से पद्म पुरुस्कारो की सूची को देखे तो पाएंगे इनमे से ज्यादातर एक साधारण जिंदगी जीते है। कइयों के पास पहनने के लिए ठीक ढंग के जूते भी नहीं है , मगर इससे उनकी गरिमा कम नहीं होती और न उनका महत्त्व कम होता है।


कोई तामझाम नहीं , कोई लावा-लश्कर नहीं , सिर्फ उनके चेहरे पर उनकी ईमानदारी, लगन और मेहनत की आभा ही उनकी पहचान है


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